एक कहानी की दास्ताँxxxxxxxPage2

(अखबार कटिंग साभार दैनिक जागरण )

देश के तमाम मुख्यमंत्री और मुख्य सरकार भारत को इंग्लैंड, अमेरिका और जापान बना देंगे कहने से थकते या चूकते ही नहीं। जबकी भारत के हृदय में अपनी ज़िंदगी के लिए जद्दोजहद से जूझता अकेला सुनसान और शोषित भारत इन्हे दिखता ही नहीं। पहले अपने घर को तो जान ही लो फिर इसका कुछ भी नाम कारण करते रहना।  बंगाल की मुख्यमंत्री जब सत्ता के रथ पर सवार हुईं तो कृष्ण वेश धर यह भविष्य वाणी कर दीं की मैं ही महामाया हूँ अर्जुन इस कोलकाता को मैं इंग्लैंड बना दूँगी। अब यह मुख्यमंत्री रूपी कृष्ण के अपने राजनैतिक कुंठाओं के कारण उसे लगता है कि केवल कोलकाता ही बंगाल है। जबकी बंगाल अभी भी उन संकटों से जूझ रहा है। जो कभी प्रगति के पुल को पार कर गईं थी। और अर्जुन यानि मुख्यमंत्री के कार्यकर्ता। इनको जब यह मालूम हुआ की ये कृष्ण रूपी मुख्यमंत्री ही महामाया हैं। तब अर्जुन ने आत्मा अजर अमर है नदी इसे भीगा नहीं  सकती और अग्नि इसे जला नहीं सकती के तर्ज़ पर इन अर्जुनों ने समूचे कोलकाता सह बंगाल को रक्तरंजिश कर दिया।

ठीक इसी तरह दो मुख्य अवतारों के माफिक एक तीसरा अवतार भी लंबे समय के बाद उत्तर प्रदेश में हुआ। आप जब उत्तर प्रदेश आएंगे और भरतपुर से लेकर बलिया तक की एक यात्रा करेंगे या इस प्रदेश में कहीं भी तो आप को पता चल जाएगा की ये अवतार कितने गन्दे इलाकों में हुए हैं। जबकी स्वच्छ भारत का शीर्षक गान हम सबके कानों में गूँजता रहता है। या इन इलाक़ो को देख आप विश्वास भी नहीं कर सकेंगे की यह अवतारी शहर के रेलवे स्टेशन से लेकर एक सुलभ तक का हाल खस्ता हो पड़ा है। पर क्या करें मेरा देश तो अवतारों का देश है ख़ैर इस तरह के दूसरे डिपार्टमेन्ट के अवतार वाले देश भी हैं। जहां अभी भी ले दना दन चल ही रहा है।

ख़ैर देश के सेकेण्ड अवतार के बाद तीसरा अवतार मोदी के चरणामृत से उत्पन्न हुआ है। कई युगों पीछे वाले अवतारों की कहानी के सुत्रधार है ये इस युग के तीसरे अवतार योगी साहब जो पुरातन ज्ञान की एक असीम शृंखला हैं। अब क्या करे मोदी महकमे के हैं तो इनके विचरण पर तो एक ही फर्क पड़ेगा कि ये पहनेगे नये खोल पर बजाएँगे पुराने ढ़ोल।

यह अवतार पुत्र भी उत्तर प्रदेश की पुलिस को साइबर का प्रशिक्षण दे रहे हैं और कानून-व्यवस्था में सुधार का परचम लहरा रहे हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस को साइबर का तो प्रशिक्षण दे रहे हैं लेकिन जो पुलिस अनायास ही गरीबों के माँ –बहन का ज़बानी बलात्कार कर देते हैं। जब की देश को माँ के पर्यायवाची के साथ जोड़ा जाता है। तब भी ये पुलिस वाले ऐसा क्यों करते हैं। इसलिए करते हैं की ये केवल एक नौकरी है एक पेशा है बस इससे ज़्यादा और कुछ नहीं। ये सुरक्षा किसको देंगे ये पहले से अनकहे तौर पर तय है और र्ये अपनी ताकत आज़माइश किस पर केरेंगे ये भी ऐतिहासिक रूप से तय है।

बड़े आश्चर्य की बात है की उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को यह सब बखूबी ज्ञात है की ये पुलिस कैसी है फिर भी वो बह रही है आपने निरंतर धून में। फिर जनमानस में विश्वास कहाँ से लाएँगे। जब इनका कोई ज़मीर ही नहीं। अगर ज़मीर का अभाव है तो अभी इंग्लैंड मत बनाइये सबसे पहले शिक्षा और संवैधानिक मूल्यों का विस्तारण करिए। इंग्लैंड बनाने का मतलब केवल दौड़ भाग करने का मैदान नहीं, बल्कि लोकतन्त्र को मजबूत बनाइये और जन मानस में इनका विश्वास भी।

उत्तर प्रदेश के इस तीसरे अवतार को यह समझना चाहिए की यह इंग्लैंड नहीं जहां पुलिस वाले को साइबर का प्रशिक्षण दे रहे हैं। पहले उनको इस तरह का प्रशिक्षण दें की ट्रक वाले के केबिन में हाथ बढ़ा अपना काम ना चलाएं, किसी रिक्शे वाले को,  किसी बेरोज़गार युवा को यूं ही अनायास ही उनपर अपने चतुराइयों और पिटाइयों के स्टाइल का प्रयोग ना करें। और इन सबके साथ उन्हे संविधान के मुकयों को पहले जानने –समझने का प्रशिक्षण मुहैया कराएं। ना की केवल मारने –पीटने के प्रशिक्षण। उनको बाताएँ की उसका क़द संविधान से बड़ा नहीं। तभी तो आप इंग्लैण्ड के स्थान पर अपना राज्य, अपना देश बाना पाएंगे। यह तब हो सकेगा जब आप अपने पुराने अवतारी खोल से निकल लोकतन्त्र में एक बार जन मानस के दिक़्क़तों और संघर्षों की बुलंद आवाज़ बनेंगे।

राजकुमार रजक

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Image  —  Posted: June 28, 2018 in Uncategorized

संपादक : अजित राय , साभार : रंग प्रसंग rang prasang cover

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शहतूत 

क्‍या आपने कभी शहतूत देखा है,

जहां गिरता है, उतनी ज़मीन पर

उसके लाल रस का धब्‍बा पड़ जाता है.

गिरने से ज़्यादा पीड़ादायी कुछ नहीं.

मैंने कितने मज़दूरों को देखा है

इमारतों से गिरते हुए,

गिरकर शहतूत बन जाते हुए.

 

सबीर हका 

अनुवाद : गीत चतुर्वेदी

जर्मनी में
जब फासिस्ट मजबूत हो रहे थे
और यहां तक कि
मजदूर भी
बड़ी तादाद में
उनके साथ जा रहे थे
हमने सोचा
हमारे संघर्ष का तरीका गलत था
और हमारी पूरी बर्लिन में
लाल बर्लिन में
नाजी इतराते फिरते थे
चार-पांच की टुकड़ी में
हमारे साथियों की हत्या करते हुए
पर मृतकों में उनके लोग भी थे
और हमारे भी
इसलिए हमने कहा
पार्टी में साथियों से कहा
वे हमारे लोगों की जब हत्या कर रहे हैं
क्या हम इंतजार करते रहेंगे
हमारे साथ मिल कर संघर्ष करो
इस फासिस्ट विरोधी मोरचे में
हमें यही जवाब मिला
हम तो आपके साथ मिल कर लड़ते
पर हमारे नेता कहते हैं
इनके आतंक का जवाब लाल आतंक नहीं है
हर दिन
हमने कहा
हमारे अखबार हमें सावधान करते हैं
आतंकवाद की व्यक्तिगत कार्रवाइयों से
पर साथ-साथ यह भी कहते हैं
मोरचा बना कर ही
हम जीत सकते हैं
कामरेड, अपने दिमाग में यह बैठा लो
यह छोटा दुश्मन
जिसे साल दर साल
काम में लाया गया है
संघर्ष से तुम्हें बिलकुल अलग कर देने में
जल्दी ही उदरस्थ कर लेगा नाजियों को
फैक्टरियों और खैरातों की लाइन में
हमने देखा है मजदूरों को
जो लड़ने के लिए तैयार हैं
बर्लिन के पूर्वी जिले में
सोशल डेमोक्रेट जो अपने को लाल मोरचा कहते हैं
जो फासिस्ट विरोधी आंदोलन का बैज लगाते हैं
लड़ने के लिए तैयार रहते हैं
और चायखाने की रातें बदले में गुंजार रहती हैं
और तब कोई नाजी गलियों में चलने की हिम्मत
नहीं कर सकता
क्योंकि गलियां हमारी हैं
भले ही घर उनके हों

बेर्टोल्ट ब्रेष्ट

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,मई-जून 2016

को साभार

 

 

ओअक्साका शिक्षकों का संघर्ष: जुझारूपन और जन एकजुटता की मिसाल

-लता- 

19 जून 2016 की शाम मेक्सिको के ओअक्साका शहर में क्रोध, भय और विद्रोह की शाम गहरा रही थी। एक छात्र ने लिखा, “मुझे लगा बारिश हो रही है लेकिन नहीं ओअक्साका रो रहा था”। नये शिक्षा सुधारों के विरोध में हो रहे प्रदर्शन पर फेडरल पुलिस ने गोलियाँ चलायी, 12 शिक्षक मारे गये और कई घायल हुए। गोलीकाण्ड के पूर्व शहर में हुई घनघोर बारिश से जैसे शोक और रोष का महौल गहरी घटा की तरह पूरे शहर पर छा गया। तूफ़ान के पहले की शान्ति में ओअक्साका अगले दिन की तैयारी के साथ खड़ा था। अगली सुबह प्रदर्शनकारियों का सैलाब ओअक्साका में उमड़ पड़ा। गली-गली से हज़ारों की संख्या  में शिक्षक और जनता रैली में शामिल होने लगी। देख कर लग रहा था मानो छोटी-छोटी जलधाराएँ विशाल समुद्र में आ कर मिल रही हों। चारो ओर ‘हत्यारे’, ‘हत्यारे’, ‘हत्यारे’ का नारा गूँज रहा था। राज्य  के सुदूर आदिवासी बहुल शहरों में शोक रैलियाँ निकाली जाने लगी। पूरा ओअक्साका राज्य और ओअक्साका शहर एक बार फिर रोष और गुस्से में सड़कों पर निकला जैसे कि 10 साल पहले शिक्षकों के प्रतिरोध के बाद हुए दमन के ख़िलाफ़़ सड़कों पर उमड़ा था; छात्रों, नागरिकों और अन्य यूनियनों की मदद से शिक्षकों ने ओअक्साका शहर पर 6 महीनों के लिये कब्जा कर लिया था। हड़ताल पर बैठे शिक्षक अपने कैम्पों में सो रहे थे जब 2006 में मेक्सिको की सेना जबर्दस्ती ओअक्साका की राजधानी में घुस आयी, ज़ोकाला शहर के चौराहे से शिक्षकों को जबर्दस्ती खाली करा दिया गया। हेलिकाप्टर से आँसू गैस के गोलों की बारिश कराई गयी। इन सब के बावजूद शिक्षक पुलिस से लड़ते हुए, विश्विविद्यालय छात्र संघ, अन्य यूनियनों और नागरिक संघों की मदद से एक-एक ब्लॉक पर कब्ज़ा करते हुए दोपहर तक दुबारा से चौराहे, ज़ोकाला, पर कब्ज़ा कर लिया और वहाँ से शुरू हुआ शहर

 

का 6 महीने का घिराव जिसे “ओअक्साका कम्यून” कहा जाता है। एक साल पहले, जून 2016 में शानदार संघर्षों के इतिहास को आगे बढ़ाते हुए एक बार फिर मेक्सिको के लोगों ने आश्चर्यजनक एकता और एकजुटता प्रदर्शित की।

जून 2016 में ओअक्साका राज्य  एक बार फिर उबाल पर था। इस बार मुद्दा स्वयं शिक्षा नीतियों से सम्बन्धित था। 2006 में भ्रष्ट गवर्नर उलिसेस रुइज़ के निरंकुश शासन के खि़लाफ शिक्षकों ने आन्दोलन की शुरुआत की थी। लेकिन इस बार मुद्दा सीधे-सीधे शिक्षकों के पेशे से सम्बन्धित था। मेक्सिको में पेन्या नियेतो की सरकार द्वारा 2012 में शिक्षा सुधारों का ऐलान किया गया। नवउदारवादी नीतियों के मद्देनजर शिक्षा को बाज़ार के हवाले करने के इरादे से लाये ये सुधार अन्य कई जन विरोधी प्रावधानों के अलावा क्रान्ति के बाद मेक्सिको में हासिल शिक्षा के संवैधानिक अधिकार को समाप्त करते थे। निश्चित ही विश्व स्तर पर नवउदारवाद के इस दौर में पूँजीवादी संकट के मद्देनज़र आज दुनिया की कोई भी सरकार, विशेष कर तीसरी दुनिया की सरकारें जनता के मूलभूत अधिकारों को समाप्त कर रही हैंै और रहे-सहे श्रम कानूनों की धज्जियाँ उड़ा रही हैं; शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा; पूँजीपतियों के हवाले किये जा रहे हैं। बड़े पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी का पद सम्भाली ये सरकारें सेना, पुलिस और कानून की मदद से शिक्षा सुधार, श्रम सुधार और अन्य जन विरोधी सुधारों को लागू कर रही है।

 

नवउदारवादी नीतियों पर आधारित इन जन विरोधी शिक्षा सुधारों के विरुद्ध मेक्सिको के शिक्षा कर्मी लम्बे समय से सड़कों पर थे। लेकिन इस बार यह संघर्ष बेहद कठिन था क्योंकि संघर्ष मात्र नवउदारवादी नितियों के विरुद्ध नहीं था बल्कि स्वयं मेक्सिको की राष्ट्रीय शिक्षा कर्मी संघ (एस.एन.टी.ई.) के नेतृत्व के विरुद्ध भी था जो भ्रष्ट पीआरआयी (इन्सटीट्यूशनल रिवोल्यू्शनरी पार्टी)  के नियंत्रण में है। ( पीआरआयी मेक्सिको की सत्ता में सबसे लम्बे समय तक रहने वाली पार्टी है, 1929 से 2000 तक बिना किसी विरोध के और एक बार फिर 2012 में पेन्या नियेतो की नेतृत्व में सत्ता में है।) शिक्षा सुधारों का खुल कर विरोध मात्र सेक्शन 22 (शिक्षक यूनियन की ओअक्साका ईकाई एस.एन.टी.ई.) की ओर से हो रहा था। सेक्शन 22 , 1980 और 1990 के दशक में सत्ता और एस.एन.टी.ई. के अंदर भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनता के पक्ष में खड़ा होने वाला एक शक्तिशाली बल रहा है। अपने इस शक्तिशाली प्रतिरोधी को कमज़ोर किये बिना पेन्या नियेतो की सरकार शिक्षा के बाज़ारीकरण की नीति सफलता से लागू कर ही नहीं सकती थी।

सेक्शन 22, 2015 तक शिक्षा सुधारों को रोक पाने में सफल रहा। शिक्षा सुधारों के प्रतिरोध के दौरान राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय दबावों के सामने सेक्शन 22 प्रतिरोध के अन्तिम बची दीवार की तरह मजबूती से खड़ा था। लेकिन जुलाई 2015 के बाद राज्य ने शिक्षकों के संघ के विरुद्ध योजनाबद्ध जंग की शुरूआत की जिसमेंं सत्ता ने तमाम शातिर चालें चली; सेक्शन 22 के ख़िलाफ़ मुख्य मीडिया और सोशल मीडिया पर शिक्षा कर्मियों की छवि बिगाड़ने के लिये सघन और सुरुचीपूर्ण अभियान चलाये गये; शिक्षकों को कामचोर कहा गया और कक्षा नियमित न होने के लिये प्रदर्शनों और हड़तालों को जि‍म्मेदार ठहराया गया। ये प्रचार शिक्षकों को बदनाम कर शिक्षा सुधारों के प्रति जनता के बीच सहमति निर्मित करने के लिये ज़ोर-शोर से चलाये गये। सेक्शन 22  की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिये संघ के खाते को बन्द कर दिये गये, कॉन्ट्रैक्ट पर आधारित सभी समझौतों को रद्द कर दिया गये, राज्य की शिक्षा एजेंसियों को ध्वस्त कर इन सारे सुधारों को जबरन लागू करवाने के लिये पूरे राज्य में फेडरल पुलिस तैनात कर दी गयी।

एकीकृत मानक पद्धति सत्ता की अगली चाल थी। इसके विरुद्ध छात्र और शिक्षक मुखरता से सामने आये। जून 19 का प्रदर्शन तमाम शिक्षा सुधारों के अलावा विशेष रूप से इस एकीकृत मानक पद्धति के विरुद्ध था। इस मूल्यांकन का अधार बहुत हद तक महँगे निजी स्कूलों के पाठ्यक्रम से मेल खाता है। व्यापक भाषायी और एथनिक भिन्नता दक्षिण मेक्सिको के राज्यों  का भौतिक यथार्थ है। ऐसी स्थिति में किसी भी एकल दण्डात्मक मूल्यांकन पद्धति को लागू करना भाषायी और एथनिक भिन्नता वाले छात्रों और शिक्षकों के साथ अन्याय होगा। यह समझ पाना मुश्किल नहीं है कि शिक्षकों की छँटनी और शिक्षा में राष्ट्रपारीय कॉरपोरेटों के प्रवेश इस मूल्यांकन को अनिवार्य बनाने के पीछे की साजिश थी। लेकिन इसे इस रूप में प्रस्तुत किया गया कि शिक्षा का स्तर सुधारने और शिक्षकों को ज्यादा जिम्मेेदार बनाने के लिये यह मूल्यांकन पद्धति लागू की जा रही है। विरोध करने वाले शिक्षकों को यह कह कर बदनाम किया गया कि वे अपनी योग्यता साबित करने से डरते हैं और जि‍न शिक्षकों ने इस मूल्यांकन में हिस्सा लिया उनके साथ राजशाही व्यवहार किया गया।

 

मूल्यांकन की एकीकृत मानक पद्धति के अलावा सुधारों का एक पहलू और भी था, पियर पेट्रोल, यानी नागरिकों द्वारा शिक्षकों की चौकसी। जनता में शिक्षकों के प्रति अविश्वास, सन्देह और संशय का महौल पैदा करने के मकसद से चौकसी की यह नीति लागू की गयी। चौकसी की इस पूरी योजना के पीछे का उद्देश्य शिक्षा के स्तर में सुधार नहीं था बल्कि मात्र सन्देह और

 

अविश्वास का परिवेश निर्मित करना था इसकी पुष्टि‍ इस बात से हो जाती है कि न्युएवो आयी.इ.इ.पी.ओ. (न्यू स्टेट इंस्टिट्यूट ऑफ़ पब्लिक एजुकेशन ऑफ़ ओअक्साना) की वेबसाइट पर अभिभावक या नागरिक मात्र शिक्षकों की उपस्थिति रिपोर्ट कर सकते हैं, शिक्षा में सुधार सम्बन्धी कोई विचार व्यक्त ‍नहीं कर सकते। यह कौन सा तर्क है कि मात्र शिक्षकों की उपस्थिति शिक्षा का स्तर सुधार सकती है। निश्चित ही उद्देश्य शिक्षा का स्तर सुधारना नहीं है बल्कि शिक्षकों में एक डर डालना है कि कोई उन्हें लगातार देख रहा है, उनकी चौकसी कर रहा है।

चौकसी, कुछ ग़लत होने से रोकने के लिये की जाती है; इसमें यह बात अन्तर्निहित होती है कि कुछ ग़लत होने की सम्भावना है; शिक्षक कुछ ग़लत करेंगे उसे रोकने के लिये चौकसी; मतलब शिक्षक कुछ ग़लत कर सकते हैं। किसी के प्रति यह भावना कि वह ग़लत कर सकता है उससे एक सहज दूरी पैदा करती है, उसके प्रति एक अविश्वा़स पैदा करती है। अपने शक्तिशाली प्रतिरोधी की मान्यता और उसकी विश्वसनीयता समाप्त करने के लिये, पियर पेट्रोल, अविश्वास से ज्यादा प्रभावी हथियार और क्या हो सकता है।

नागरिक और शिक्षकों की मजबूत एकता का लम्बा इतिहास सत्ता के लिये बिना शक  चुनौती है। निजीकरण, नवउदारवाद और खुले बाज़ार की नीतियों को धड़ल्ले  से लागू करने के लिये इस एकता को समाप्त करना सत्ता की  प्राथमिक आवश्यकता थी क्योंकि यह एकजुटता सत्ता  के शोषण और दमन के विरुद्ध मजबूत दीवार की तरह आज तक खड़ी रही है। सत्ता द्वारा नियोजित चौकसी की ठण्डी हिंसा राज्यों द्वारा प्रायोजित उग्र हिंसा के काल में बर्बरता को बहुत हद तक मान्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। लेकिन शिक्षकों और नागरिकों के बीच दरार पैदा करने की तमाम कोशिशों के बावजूद; मुख्य मीडिया और सोशल मीडिया पर बदनाम करने के धुआँधार अभियान के बावजूद; पूँजीवादी सत्ता द्वारा लोहे के हाथों से लागू नवउदारवाद और निजीकरण की नीतियाँ  शोषित जनता को साथ ले आती है। निजीकरण की मार मात्र शिक्षकों को झेलनी पड़ रही है ऐसा नहीं है, सभी क्षेत्र निजीकरण, उदारीकरण और खुले बाज़ार की नीतियों की मार झेल रहे हैं। ओअक्साका की जनता की हालत भी कुछ भिन्न नहीं है। ओअक्साका आदिवासी बहुल राज्य है तथा यह मेक्सिको का सबसे ग़रीब राज्य भी है। ओअक्साका में स्कूल से बाहर छात्रों की संख्या सबसे ज्यादा है। इस राज्य के प्राकृतिक संसाधनों और भूमि के दोहन की राष्ट्रपारीय कम्पनियों को खुली छूट दी गयी है। इसके अलावा फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (मुक्त  व्यापार समझौता) और नॉर्थ अमेरिका फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (उत्तर अमेरिका मु‍क्त व्यापार समझौता) के अनुसार मेक्सिको के घरेलू बाज़ार में विदेशी माल के बेरोक-टोक प्रवेश की अनुमति है – यहाँ तक कि विदेशों से मक्का और बीन्स भी यहाँ के बाज़ारों में आते हैं – ये दोनों अनाज दक्षिणी मेक्सिको के प्रमुख आहार हैं; वि‍देशी मालों से बाज़ार पटने की वजह से स्थानीय किसानों की खेती तबाह हो रही है। कृषि के तबाह होने से हज़ारों की संख्या में किसान और मज़दूर जोखिम भरी सीमा पार कर अमेरिका में कम मजदूरी पर बेहद असु‍रक्षित रोजगार करने के लिये मजबूर हैं। राज्य में पर्यटन के बाद विदेशों में काम करने वाले देशी कामगारों द्वारा भेजा गया धन राज्य की आय का दूसरा प्रमुख स्रोत है।

शिक्षकों का जनता के संघर्षों में हमेशा साथ देना और नवउदारवादी नीतियों की लगभग समान मार जन एकजुटता को सशक्त और संघर्ष को अनिवार्य बनाती है। पेन्या नियेतो की तमाम कोशिशों के बावजूद सेक्शन 22  के प्रतिरोध में कमी नहीं आयी और न ही जनता की एकजुटता में; अपने 2006 के अनुभव से सबक लेते हुए राज्य सत्ता ने दमन को ज्यादा नियोजित, व्यवस्था और बर्बर बनाया। आन्दोलन को कमजोर करने के लिये राज्य सत्ता ने सदियों से परखी चालें चली; चुन-चुन कर नेतृत्व के लोगों की हत्या  करवाई गयी; आन्दोलन से जुड़े लोगों को ग़ायब करवाया गया। 2014 में शिक्षा सुधारों का विरोध कर रहे छात्रों में से ग़ायब 43 हमें याद हैं। मेक्सिको में इन ग़ायब छात्रों के इर्द गिर्द भी एक मजबूत आन्दोलन खड़ा हुआ था लेकिन बावजूद इसके उनकी कोई ख़बर नहीं मिली। उसके अगले वर्ष ही 4 शिक्षकों की हत्या करवायी गयी। फिर 4 ओअक्साका शिक्षक नेता गिरफ्तार किये गये और दर्जनों के खि़लाफ गिरफ्तारी का वारण्ट जारी किया गया।

2006 में फेडरल पुलिस ओअक्साका शहर में 6 महीने बाद आयी लेकिन इस बार यह सुधार लागू करने के साथ ही शहर में प्रवेश कर गयी। अपनी चमचमाती कारों में पुलिसकर्मी शहर के प्रमुख चौराहों और स्थलों पर तैनात हो गये। स्कूलों में विनिर्माण के नाम पर प्रवेश कर फेडरल पुलिस ने यह बात मीडिया और रेडियो से स्पष्ट कर दिया कि वह किसी भी स्थिति के लिये तैयार है। सेक्शन 22  ने मुख्य मार्ग के घेराव का कॉल दिया जिसका समर्थन एस.एन.टी.ई. ने नहीं किया। नोचिक्सतलान शहर से मेक्सिको सिटी की ओर जाने वाले मुख्य राजमार्ग पर घेराव का यूनियन की स्टेट असेम्बली ने नहीं बल्कि आम नगरिकों ने समर्थन किया। 19 तारीख को फेडरल पुलिस ने प्रदर्शनकारी शिक्षकों पर गोलियाँ चलायी जिसमें 12 शिक्षक मारे गये। मुख्य मीडिया ने रिपोर्ट किया कि पुलिस के पास कोई हथियार नहीं थे। लेकिन जल्द  ही सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई जिसमें एक पुलिस कर्मी किसी शिक्षक की ख़ून से लतपथ लाश को जीत की ट्रॉफी की तरह दिखा रहा था;  साथ ही यह प्रदर्शनकारियों को चेतावनी भी थी कि यदि प्रदर्शन जारी रखे तो देखो क्या हस्र होगा। इसके अलावा अन्य कई तस्वीरें और वीडियो सामने आये जिसमें प्रदर्शन के दौरान गिरती लाशें दिखीं और हथियारों से लैस फेडरल पुलिस दिखे। इन तस्वीरों और वीडियो के सामने आने के बाद दबी ज़ुबान में मुख्य मीडिया गोली चलने की बात दिखाने लगी और पुलिस भी हथियारों के इस्तेमाल की बात मानने को मजबूर हुई। एस.एन.टी.ई. के समर्थन नहीं करने के बावजूद आम जनता ने शिक्षकों का साथ दिया। प्रतिरोध में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने के अलावा अब यह आबादी राज्य से स्पष्टीकरण की माँग कर रही है कि कैसे उसने फेडरल पुलिस को साप्ताहिक बाज़ार के दिन शहर में घुसने की इजाज़त दी। साप्ताहिक बाज़ार के दिन आस-पास के इलाकों से भारी तादाद में लोग सामान बेचने और खरीदने आते हैं। 19 जून को पुलिस आँसू गैस के गोलों के साथ रंगभेदी भाषा का प्रयोग यहाँ के निवासियों और शिक्षकों के ख़िलाफ़़ कर रही थी। 19 जून के गोली काण्ड के अगले दिन जब शिक्षक और नागरिक सड़कों पर उतरे तो हेलिकॉप्टर प्रदर्शनकारियों के इतने करीब से उड़ रहे थे कि उनके रोटर ब्लेड की तेज हवा प्रदर्शनकारियों  को तितर-बितर करने के लिये ऑंसू गैस के समान काम कर रही थी। इसके साथ ही रोटर ब्लेड की तेज़ खरघराती आवाज़ पूरे शहर में युद्ध जैसा डरावना महौल पैदा कर रही थी। लोगों में खौफ़ पैदा करने की पूरी कोशिश की गयी। लेकिन यह ओअक्साका शहर था जिसने पूरी वीरता के साथ दमन के इन रूपों का सामना 11 साल पहले भी किया था।

फेडरल पुलिस ने तमाम मानव अधिकारों और नैतिक मूल्यों को ठंडे बस्ते में रख कर घायल शिक्षकों और नागरिकों तक चिकित्सा  मदद तक नहीं पहुँचने दी। अस्पतालों ‍में मात्र पुलिस कर्मियों का इलाज चल रहा था और नागरिकों को अस्पतालों  तक पहुँचने नहीं दिया जा रहा था। उनकी  गाड़ियों को रोका जा रहा था और जो डाक्टर नागरिकों और शिक्षकों के इलाज के लिये स्वयं आगे  आ रहे थे उन्हें पुलिस चौकियों पर रोक दिया जा रहा था। अन्तरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुसार फैन्सी बुर्जुआ शब्द में यह ‘वार क्राइम’ के अन्तर्गत आता है और यूनेस्को द्वारा इनकी जाँच के आदेश दिये गये हैं। (हर रोज सत्ता द्वारा आम जनता के अधिकारों का हनन, उनका उत्पीड़न जैसे अपराध नहीं है!) 19 जून से पहले और 19 जून के बाद लोगों में भय और आतंक फैलाने के लिये कुछ विषेश लोगों को चुन-चुन कर मारा गया। ऊपर 43 ग़ायब छात्रों के ग़ायब होने और चार शिक्षकों की हत्या की बात लिखी गयी है। 19 जून के बाद एक हुआ खापान (नोचिक्सतलान के निटक)

में एक कम्युनिटी जर्नलिस्ट और एक अनार्किस्ट की हत्या कर दी गयी जो 19 जून की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करने वाले तू उन न्यून सावी (बारिश के लोगों की आवाज़) रेडियो स्टेशन का समर्थन कर रहे थे।

इस पूरे आन्दोलन का सबसे शानदार पहलू था स्थानीय रेडियो विश्वविद्यालय पर छात्रों का कब्ज़ा और वहाँ से शिक्षकों के समर्थन में खबरें प्रसारित होना। रेडियो प्लॉन्टोन, शिक्षकों का रेडियो स्टेशन, इसकी फ्रिक्वेन्सी सरकार ने पहले ही अवरुद्ध कर दी थी इसलिये रेडियो विश्वविद्यालय एकमात्र आवाज़ थी जो शिक्षकों के समर्थन में ख़बरें दे रही थी और राज्य के दमन को दिखा रही थी। रेडियो विश्वविद्यालय की रक्षा में चारो ओर छात्र, नागरिक और शिक्षक पहरे दे रहे थे जिस पर भाड़े के  पोर्रो (स्थानीय गुण्डे और लम्पट) से हमला करवाया गया। शिक्षकों के समर्थक पूरी रात रेडियो स्टेशन की निगरानी में पहरे पर रहे और भाड़े के गुण्डों के साथ उनकी झड़पें भी हुई। स्थानीय मीडिया ने जम कर आन्दोलन के खि़लाफ़ में कुत्साप्रचार किया; अच्छे  और बुरे प्रदर्शनकारियों के नाम पर लोगों को बाँटना चाहा; मीडिया ने घोषणा की कि 19 की रात शहर के मुख्य‍ चौराहे पर घेराव करने वालों में “अपराधियों” की बहुतायत है और ये मारपीट कर रहे हैं। कुछ हद तक लोग चिन्तित भी हुए लेकिन शहर के ज्यादातर लोग घेराव में शामिल थे और वे साफ देख सकते थे कि ये अफवाहें हैं और 2006 की ही तरह रात के घेराव के दौरान शामिल लोगों में औरतों की संख्या विशेष तौर से ज्यादा थी। 2006 में तो रेडियो विश्वविद्यालय पर बहादुरी से लड़ कर कब्ज़ा लड़कियों ने ही किया था और वे ही संघर्ष की खबरें प्रसारित करती थीं। स्थानीय मीडिया ने यह भी प्रचारित किया कि राजमार्ग के घेराव की वजह से लोगों को मूलभूत ज़रूरतों की पूर्ति नहीं हो पा रही है। लेकिन स्थानीय लोगों ने बताया कि सेक्शन 22 के शिक्षक कॉरपोरेट की गाड़ियों को रोक रहे थे जैसे कोका कोला आदि। निश्चित ही मुर्गे और फलों की आपूर्ति प्रभावित हुई लेकिन जैसे कि ओअक्साका के स्थानीय लोगों का कहना है कि वे बिना किसी बाहरी आपूर्ति के महीनों तक रह सकते हैं क्योंकि कठिन जिन्दगी की उन्हें  आदत है।

 

 

19 जून का आन्दोलन एक शानदार संघर्ष और जनता की चट्टानी एकजुटता की मिसाल है; निजीकरण और नवउदारवाद के विरुद्ध विश्व में कई आन्दोलन चल रहे हैं लेकिन इतने उग्र और सशक्त प्रतिरोध जिसमें  प्रदर्शनकारियों ने शहर को अपने कब्जे  में ले लिया हो बेमिसाल है। विश्व  के हर कोने में संघर्ष कर रहे लोगों को ऐसे संघर्ष ऊर्जा प्रदान करते हैं। शहर में गवर्नर रुइज़ के भाई की निर्माण कंपनी के नवीनीकरण की योजना ने शहर के पुराने उद्यानों और नागरिक स्थलों को तहस-नहस कर दिया था; जनता इससे पहले ही गुस्से में थी और जब शिक्षकों के दमन के लिये हेलिकॉप्टवर से आँसू गैस के गोले बरसाने लगे तो यह बरदाश्त से बाहर था। जनता ने शिक्षकों को पानी, छुपने की जगह दी और अन्य मदद पहुँचायी।

मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आह्वान,जुलाई-अगस्‍त 2017

का आभार की उनहिने इस लेख को प्रकाशित कर इस संघर्ष की बिगुल को प्रसारित किया। शुक्रिया

 

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