Archive for August, 2014

दूर गुंबद

Posted: August 9, 2014 in Uncategorized

मेरे पैरों की उँगलियों को काट लिया गया

मैने कुछ नहीं कहा

मेरे दोनों पैर काट लिए गए

मैंने कुछ नहीं बोला

मेरे हृदय को काट दिया गया

मैंने कोई भी सुगबुगाहट नहीं की

मेरे दोनों कंधो को काट दिया गया

अभी भी मैंने उफ तक नहीं कहा

मेरे दोनों आँखों को निकाल लिया गया

मैंने सिसकियाँ तक नहीं भरीं

मेरी ज़बान को कई टुकड़ों में काट दिया गया

मैंने आवाज़ तक नहीं उठाई

मेरे लहू के क़तरे में सुअरी के बच्चे लतपत खेल रहे हैं ।

मैं और मेरी आवाज़ शहर से दूर किसी गुंबद पर निष्ठुर बैठे आपस में एक –दूसरे को निहार रहे हैं । शायद इस बार तो ज़रूर……।

राजकुमार

टोंक , 9/08/14

मैं अपराधी हूँ

तुम भटकती नदी की धार की तरह कहीं न कहीं अपना मार्ग खोज लेते हो । मन की तमाम वेदनाओं के बावजूद तुम पुनः वेदना रचते हो । तुम तमाम खोजों के निष्कर्ष पर अटके हुए बिच्छू की तरह रेंगते हुए अपनी उम्र के दोषी बनते ही रहे हो । तुम्हारे विलय और प्रलयंकारी प्रेम के जहर से मोहित बार-बार मैं इसमें अपनी सांस भरता रहा हूँ । आखिर अब फिर जानने की जिज्ञासा शेष है । क्या प्रलय में सांस लेना अपराध है या कुटिल कौशल । तुम्हारे प्याले में महकता विष मुझे पुनः आमंत्रित कर रहा है । मैं अपने कंठ के अंतिम सुर तक तुमको पुकारूँगा। मैं तुमको अपने अंतिम क्षितिज के पथ पर खोजुंगा । क्या ये खोज अपराध है । मैं तुमसे बार-बार जानने की गुजारिश करता रहूँगा खोज के अंतिम से अंतिम परिणत तक ….. तभी तुमको फिर से पुकार बैठूँगा । इस गुजारिश में की मैं फिर से विषपान के पात्र को अपने कंठ से लगाना चाहता हूँ । मैं अपराधी हूँ अपने प्रश्नो का , मैं अपराधी हूँ अपने खोज का , मैं अपराधी हूँ अपने उत्सुकता का । मैं अपने अपराध से परे भी तुमको खोजता रहूँगा अनंत के इस गभीर जल श्रोत में ……. भटकती नदी की धार बनने की तलाश में …… !!!!

जीवन संगनी के प्रेम में !!!!!!

राजकुमार