Archive for November, 2014

स्वायत का संकट
“What profit has man of all his labour wherein he laboureth under the sun? One generation passeth away, and another generation cometh; but the earth abideth forever. . . . The sun also ariseth, and the sun goeth down, and hasteth to the place where he arose.” . . . Ecclesiastes

“Deprive the average human being of his life-lie, and you rob
Him of his happiness.”- Henrik Ibsen
मानव अपने जरूरतों को पूरा करने में सदा ही व्यस्त रहा है । तमाम जरूरतों के चलते मनुष्य प्रकृति के यथार्थ रूपों को भी उजागर करता चला है। जिससे मनुष्य निरंतर महाशक्तिवान बना है । सभ्यता के चक्रव्यूह में वो अपने महत्वाकांक्षाओं के घनघोर भँवर जाल में बार-बार अटकता जा रहा है । इस मूल्यांकन में जहां वो अपने शक्ति का विस्तार करता हुआ आगे चल रहा है, वहीं उसका आंतरिक यथार्थ सिकुड़न भी बढ़ता ही चला है। महत्वाकांक्षा की जाल में फंसा मनुष्य स्वयं की परिधि से बाहर निकल नहीं पा रहा है. वह चाहे अनचाहे आपसी सुख-दुःख की सीमाओं से स्वयं को विलग कर रखा है ।

वर्तमान के इस “अल्ट्रा स्पीड” जीवन में भले ही भौतिक रूप से मनुष्य एक दूसरे से दूर है किन्तु सूचना क्रांति के इस युग में आभासिक रूप हम एक दूसरे के बहुत करीब हैं। आभासी समीपता के बावजूद मानव- मानव के बीच पहले से कहीं ज्यादा आपसी एवं सामाजिक सम्बन्धों में रिक्त स्थान बन पड़ा है। इस रिक्त स्थान को बाज़ार अपने जरूरतों के मद्देनजर बढाता रहता है। बाजार के मकडजाल में फंसा मनुष्य स्वयं अपनी पहचान खोता जा रहा है. अधिक से अधिक सुख बटोरने की स्पर्धा में व्यक्ति से व्यक्ति अदृश्य होता जा रहा है, व्यक्ति से परिवार अदृश्य होता जा रहा है, परिवार से समाज अदृश्य होता जा रहा है। मानवीय संबंधों में घुटन और टूटन एवं सामाजिक संबंधों में दरार इसका प्रतिफल है । व्यक्तिगत एवं सामाजिक संबंधों में रिक्तता से जनित अवसाद के कारण मानव का आन्तरिक यथार्थ प्रकाश से दूर और अंधेरे के गिरफ्त में समा गया है। जहां मनुष्य मुक्ति रूपी प्रकाश से भय खाता हुआ बार-बार अपने महत्वाकांक्षाओं के अँधेरी गुफा में अकेला भटक रहा है। इन अँधेरी गुफाओं में किसी विश्वास के लिए कोई जगह नहीं है और न ही इन गुफाओं में एक–दूसरे से स्वर संगति बनाने की जगह है। हम लगातार सलमे सितारे से जड़ी चकाचौंध कर देने वाली बाज़ार के मायावी रोशनियों में स्वयं को खोते जा रहे हैं । यथार्थ से अधिक वर्चुअल दुनिया के मायावी ताने-बाने में गुम होकर मनुष्य स्वयं के भीतर एक विराट शून्य का निर्माण कर रहा है। एक अंजान प्रतिस्पर्धा एवं अंजान स्टेटस के लिए लालायित मनुष्य तमाम भौतिक सुख सुविधाओं की उपलब्धता के बावजूद “कस्तूरी कुंडल बसे मृग ढूंढे वन माहि” की तरह भटक रहा है। हम जीवन के यथार्थ दृश्य से कहीं ज़्यादा स्वयं रचित वर्चुअल दुनिया में अपना पंख पसार रहे हैं और प्रकाश से डरते हुए वर्चुअल एवं सामाजिक अर्थ नैतिक डैडलॉक में लगातार चक्कर काट रहे है । अपने लिए जानलेवा अजीब बदबूदार कुंठा एवं संत्रास की दमघोटू काल कोठरी का ईजाद कर रहा है। जिसकी अंतिम स्थिति है मात्र डेडलॉक ।

डेडलॉक अथवा संवादहीनता की स्थिति से निजात पाने और इसके द्वंद्वों से निपटने के लिए हमें , अपने परिवार और अपने पड़ोसी के बीच में संवाद कायम करने की आवश्यकता है। अपने अन्दर के खालीपन से जनित संबंधों में परस्पर बढ़ते अविश्वास की खाई को पाटने के लिए संवाद की आवश्यकता है। संवाद ही वह पुल है? जो दो परस्पर विरोधी कगार को मिलाएगी।  इसके द्वारा ही हम, अपने परिवार और पड़ोसी के बीच न्यायपूर्ण स्थान एवं वातावरण का निर्माण किया जा सकता है ?

राजकुमार रजक
30/04/14
टोंक