रन्नु

Posted: May 9, 2021 in Uncategorized

रन्नु

रन्नु ने अभी तक जो कुछ भी जीता है वो है चिलबिलाती धूप से टक्कर, उसका शरीर पसीने को पार कर तपिश में  कब का ही प्रवेश कर चुका है। घर पहुँचने की प्रबल लालसा ने उसके पैरो की डोर को आज़ाद कर दिया है। उसके गाँव की खुश्बु उसकी नाक से अभी दूर है। रह रहकर के रन्नु की आँखों के सामने ऐसा अंधेरा छा जाता है। मानो दिन में अमावस रात उतर आई हो। इस रात और दिन की पहेली को बुझते हुए रन्नु बेचैन उस दिशा में बढ़ रही है जिधर से उसके  गाँव की महक उसके नाक में आने लगती है और फिर धीरे –धीरे वो अपने घर की महक में लीन हो जाती है। इसी दौरान मजदूरों के झुंड पर इसकी नज़र पड़ती है। सभी दूर खेत में पेड़ों के नीचे आराम कर रहे हैं ऐसा लग रहा है कि कोई एक छोटा सा साप्ताहिक हाट लगा हो।

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रन्नु भी उन्ही मुँह ढके मजदूरों के झुंड के पास जाकर आँचल भर एक छाँव के टुकड़े में थकी मांदी सो जाती है। उसके सोये हुए चेहरे पर थकान धीरे-धीरे एक भय में तब्दील होती जा रही है। उसके माथे पर पसीने की बूंदें  बुदबुदाने लगती है और होश में आकार भीषण चित्कार करने लगी भागो – भागो बचो। आस –पास के लोग समझ नहीं पाए की क्या हुआ पर रन्नु से दूर बैठे लोगों में ज़रा हलचल हुई कई तो भागने भी लगे। रन्नु को कई मज़दूर शांत कराने लगे लेकिन कोई उसे छूता नहीं, महामारी के डर से लोग दूर से ही बोलते अरे! लड़की क्या हुआ…कोई सपना देख रही है क्या? रन्नु अपनी ही धुन में रम गयी। मानो उसके अंदर लक्ष्मीबाई का प्रेत घूस गया हो। वो चित्कार कर रही थी ‘कि देखो वो शेर बेकाबू हो कर ज़िंदा इन्सानों को चट करता जा रहा है कैसे लोग भाग रहे हैं, त्राहि –त्राहि है। देखो ये क्या एक दो शेर नहीं ये तो जंगली शेरों का झुंड है जो इस सड़क पर तांडव कर रहा है। कुछ लोग सच में हदस गए और घबरा कर इधर उधर कटने लगे। आस –पास की झाडियाँ हिलती तो लोग सकपका जाते। रन्नु के आसपास की भीड़ के कुछ लोग नज़र दौड़ाने लगे सड़क की ओर। रन्नु अभी भी भीषण चित्कार कर रही थी ‘कि देखो उस औरत को जिसपर शेरों के झुंड ने हमला बोल दिया है। वो देखो पहले वो उसके कपड़े को खाल की तरह उतार फेंक रहे हैं । उसके शरीर को खा जाने के लिये शेर आपस में ताक़त की आजमाइश करने लगे हैं। ऐसा सर्कस कभी भी किसी कहानी तक में नहीं सुना। वो देखो उस बब्बर शेर ने एक ही बार में उस महिला के शरीर को तड़पते लोथड़ों में बदल दिया है। वो कोई साध्वी थी, शायद उसके हाथ का यह झण्डा वहीं खून से लथपथ है।

रन्नु घबराई हुई भागने को हुई कि देखा उसके आजूबाजू लोग एक  घेरा बना कर खड़े है और मानों उसकी आँखों में उसकी आवाज़ में  हो रही हलचल के भीषण दृश्य को देख रहे हों।

रन्नु ये देखकर है हैरान रह जाती है कि लोग उसे क्यों निहार रहे हैं । वो समझ जाती है और अन्य थैले से पानी पीती है। लोग वापस अपने –अपने दिशा में जाने लगते हैं। रन्नु की नज़र वापस उस बनियान पर पड़ी जो रन्नु के सोते समय आँख मिला रही थी। पसीने से तरबतर धूल से सना हुआ एक पैदल मजदूर के इस बनियान पर लिखा था माँ भारती की जय और इसके नीचे लिखा था। इस बार देसी सरकार। रन्नु इस बनियान को गौर से निहारती हुई उठ पड़ी और आगे अपने गाँव की दिशा में चल पड़ी। रन्नु ने इस तस्वीर में बनी उस त्रिशूल वाली महिला को मरते देखा, शेरों के झुंड ने उसको खत्म कर दिया। रन्नु ने ये सब घटना अपनी आँखों से देखा था। वो इसे भूल नहीं पा रही थी। लगभग सौ किलोमीटर चल चुकी थी गाँव की खुश्बु दूर से उसके नाक से संपर्क करते हुए, उसके घर पहुचने की आस को तरोताज़ा कर रही थी। उसकी आँखों में एक लंबी अमावस रात उतर रही थी। कभी खत्म न होने वाली इस रात में रन्नु समाती ही जा रही थी। उसके पैरों को अब चलने की आदत सी पड़ चुकी थी। रन्नु का शरीर कब का मर चुका था। ये उसके गाँव की ही खुश्बु थी कि उसके पैरों को खींच रही थी। अंततः इस खुश्बु की यह अंतिम तार भी हमेशा –हमेशा के लिए छुटता चला ही जा रहा था। अब जब वो इस ज़मीन पर गीरी तो हमेशा के लिए उसकी आँखों में बस पड़े अमावस के साथ ही गीरी। उसके पैरों की इच्छा अभी भी बाकी थी पर क्या करे, उसने देखा था कि ती-शर्ट पर छपी  माँ भारती अब नहीं रही,  वो दिवंगत हो चुकी थी।  शेरों के पंजों ने उन्हे लील लिया था। रन्नु का चेहरा और हृदय चिरनिद्रा में सो चुके थे। उसके पैर जैसे घर की तरफ बढ़ जाने के लिए हर अंतिम कोशिश कर रहे थे। इन मृत सड़कों पर उनको चलने की आदत पड़ गयी थी।

राजकुमार

26 मई, 2020

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