स्मृतियों की राजनीति

Posted: May 5, 2021 in Uncategorized

हमारे मस्तिष्क की जटिल बनावट लाखों वर्षों में विकसित हुई है। अब हम कुछ हद तक यह कहने की स्थिति में हैं कि हमारा मस्तिष्क एक बड़े कारखाने की तरह है। जिसमें जटिल संरचना वाले छोटे बड़े कई कमरे हैं। जो अलग -अलग कार्यों में जुटे रहते हैं और हमारे  दिनचर्या की गाड़ी बनते हैं। इनमें कल्पना, संवेग, नितप्रति निर्मित होती यादें मौजूद हैं। हमारी प्रत्येक गतिविधि सामाजिक संबंधनों से जुड़ी हुई है और लगातार समाज से जटिल संपर्क साधती रहती है। हम जो हैं वही समाज है और समाज जो है हम वही है। हमारी यादें हवा में नहीं बनती जबकि हवा हमारी यादों का कोई पहलू ज़रूर हो सकता है। हमारी यादें जहां रहती हैं उनका कमरा कुदरत ने ज़रूर बड़ी सहूलियत से बनाया है और हमारे बचने के परिश्रम में यह विकसित होता चला है।

 जहां की हार्डडिस्क भरती नहीं वो असीम है। आप को किसी ने क्या कहा या क्या किया अथवा क्या कहा था क्या किया था या और भी जो कुछ है सब यादें हैं और यह जब सामने आता है तो हम प्रभावित होते हैं।

हम बहुत ही प्रभावित हुए, मजदूर दिल्ली से, बंबई से कलकत्ता से और न जाने कहाँ – कहाँ से अपने घर वापस जाने लगे। कोविड महामारी के डर से । अपरिपक्व तालाबंदी की योजना के डर से देश के राजमार्गों और रेल मार्गों पर मजदूरों का रेला देखते ही बनता था। पहली बार मालूम चल रहा था की इस देश में मजदूर कहाँ -कहाँ रोज़ी रोटी रच रहे थे।

इन दृश्यों पर हजारों मीडिया कर्मी, राजनैतिक कर्मी, राजनेताओं के दिलासे वाले बयान सोशल मीडिया पर ऐसे तैर रहे थे जैसे कोई व्हेल मछली आ टपकी हो हमारे  तालाब में। कई पत्र -पत्रिकाओं में इन मजदूरों की बेहाल तस्वीरें धड़ल्ले से छपीं। देश की जनता के रूप में मजदूर कभी रेल से कटे तो कभी हाइवे की दुर्घटनाओं में चले गए। ये यादें देश की छाती में छप गईं।    

अब देखिये यादें बहुत ही ज़रूरी हैं जीने के लिए यहाँ तक की एक कदम के बाद अलग कदम रखने के लिए भी। पर इन यादों को कारखाने की सबसे दूर कोठरी में धकेल दिया गया जहां वो अनिश्चित काल के लिए गहन निद्रा में चली जाती है। क्योंकि इसको गहन तल में भेजने के लिए बहुत ही मशक़्क़त करनी पड़ी। जैसे साकेत परियोजना का प्रचार देश के गली -गली घर -घर तक में किया गया चंदा उगाहा गया। चुनावी माहौल में टक्कर दर टक्कर शोर गुल तैयार किया गया। प्रवासी मजदूरों की कहानी शिथिल हो ही गयी। इसके स्थान पर राष्ट्र में बिरादरी के संकट को बड़ा कर दिया गया। हिंसा की मशीनरी अपने उत्पाद में व्यस्ततमलीन हो गयी। दिल्ली फिर से दंगाओं में गहम हो उठी थी। इन सबने ऐसी भूमिका निभाई की जीवन के संघर्ष की महागाथा गाती मजदूरों के विस्थापन की स्मृतियाँ अखबारों में कहीं खो गयीं।

स्मृतियाँ मिटती नहीं उन्हे दूर कोठारी में भेजना होता है और नयी स्मृतियों को बारंबार तरह तरह से पोषित किया जाता है और इससे पहले की स्मृतियाँ वैसे ही धूमिल पड़ जाती है। यह हमें पहले ही समझने की ज़रूरत थी कि स्मृतियों पर भरपूर प्रयोग किया जाना राजनैतिक दलों का आहार है। यही हुआ जिसने मजदूरों के घर वापसी की गाथा को खा -पचा लिया। ठीक इसी तरह  किसान आंदोलन की एक अभी बन रही नयी स्मृति को बंगाल के चुनावी बिगुल संरचना ने रुख मोड़ने का हर भरसक प्रयास किया।

अब देश की जनता जनार्दन को यह मजबूती से समझना होगा और निर्णय बनाना होगा कि हजारों लाशों की ये जो आहुति हो रही है और अभी कई हज़ार लोग इस आहुति के मुँह पर आ खड़े हैं इन स्मृतियों को जाया न जाने दे। इन स्मृतियों को तब तक सामने खड़ा किये रहने की ज़रूरत है जब तक एक -एक आहुति का जवाब नहीं मिल जाता कि वो भी देश के नागरिक थे जो चले गए हैं और वो भी हैं जो कतार में हैं। प्रत्येक पल जब आप सुनते हैं कि कोविड की बदहाल व्यवस्था में मृत्यु की संख्या तीव्र गति से बढ़ रही है और अपने मोबाइल में सुरक्षित सैकड़ो नंबर में से कई नंबर अब डिलीट हो जाएंगे अब वो कभी बात नहीं कर पाएंगे। वो कोविड के ग्रास बन गए और स्वास्थ्य व्यवस्था की लाश हो गए। इस पर तो मन कुढ़ जाता है। लाचार और बेबस एक हताश सी स्थिति बन जाती है। इन स्मृतियों को उर्वरा होना ही होगा। जो देश के हाकिम के अभिमान को मटियापलीद करेगा।

जन स्मृतियों और कल्पनाओं पर इतना प्रयोग किया गया है और इसे बीमार किया गया है की विद्यालय के बच्चे से लेकर उसके माँ-बाप तक यह मान लिया जाता है कि सड़क, बिजली और पानी ही चुनावी एजेंडा हैं और गाँव में शहर में इसके आते ही विकास मान लिया जाता है या यूं कहा जाये की विकास का चेहरा ऐसे ही प्रस्तुत किया जाता रहा है। यह बिजली, सड़क और पानी आज़ादी के बाद से ही आज़ाद आज़ाद देश में एक सबब बनी पड़ी है। राजनेताओं से लेकर ग्राम सरपंच तक के द्वारा यह घोषित कर दिया जाता है कि यह सड़क, पानी , बिजली ही विकास है। इसी भ्रांति के कारण आज हम ऑक्सीज़न, बेड और शमशान के मध्य आ खड़े हुए हैं। हमें अपने पाठ्यक्रमों से लेकर अभिभावकों तक और हम सभी के दैनिक जीवन तक स्मृतिजाल के भ्रांति को मिटानी होगी। हमें प्रत्येक नागरिक को स्वयं इस घोषित विकास की घोषणा कि यादों से बाहर निकाल आना होगा और स्वास्थ्य , खाद्य और शिक्षा के नारे को बुलंद करना होगा। अपनी स्मृतियों में इसे बार -बार बसाना होगा जिससे भाषणों के भीतर बह रहे स्मृतियों के मायाजाल से देश को सचेत किया जा सके और समृद्ध बनाया जा सके। लोकतन्त्र को ऑक्सीज़न दिया जा सके।  

देश की स्वास्थ्य व्यवस्था कोविड से पहले भी एसी ही थी ये तो कोविड के आने से भरपूर मात्र में उजागर हो गयी है। अतः इस स्मृति को हमें सामने रख कर ज़िम्मेदारी से जिम्मेदार लोकतन्त्र को खड़ा करना ही होगा तभी इस देश के लोकतन्त्र के स्वास्थ्य को सुखाय बनाया जा सकेगा। लोकतन्त्र की ज़िम्मेदारी वाला जिम्मेदार नागरिक के स्मृतियों के नव निर्माण के अवसरों को गढ़ा जा सकेगा।

राजकुमार

अप्रैल 29, 2021

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